Tuesday, 9 June 2020

550 केस, 400 मर्डर, 650 अपहरणः इस डाकू के नाम से कांपती थी पुलिस, पत्नी-बेटी को दी थी मौत


चंबल का इलाका डाकूओं के लिए जाना जाता है. चंबल घाटी से कई ऐसे डाकू निकले, जिन्होंने पुलिस और जनता के नाक में दम कर दिया था. लेकिन कुछ डाकू ऐसे भी थे, जो भले ही कानून की नजर से बड़े मुजरिम थे, मगर स्थानीय लोगों के लिए वो किसी मसीहा से कम नहीं थे. पुलिस उनके नाम से कांपती थी, लेकिन ग्रामीण उन्हें सिर-आंखों पर बैठाते थे. ऐसा ही एक नाम था डाकू मोहर सिंह. जिसके नाम का आतंक इतना था कि पुलिस के साथ-साथ इलाके के अपराधी भी उससे खौफ खाते थे. उसी मोहर सिंह का मंगलवार को निधन हो गया.
कौन था डाकू मोहर सिंह
चंबल घाटी के लिए मोहर सिंह का नाम किसी खौफ से कम नहीं था. कुछ लोग उसे रॉबिनहुड मानते थे. सरेंडर करने के बाद वो लंबे समय से बीमार थे. मंगलवार को मोहर सिंह ने आखरी सांस ली. आखिर मोहर सिंह डाकू कैसे बने, आइये आपको बताते हैं...
वो साल 1960 था. जब मोहर सिंह ने बंदूक उठाई और बीहड़ में कूद पड़े. बताया जाता है कि मोहर सिंह कभी डाकू बनना नहीं चाहते थे. लेकिन एक जमीन से जुड़े मामले में जब वो दर-दर की ठोकरें खाते रहे. अफसरों से और पुलिस से गुहार लगाते रहे लेकिन उन्हें इंसाफ नहीं मिला. सिस्टम से नाराज होकर मोहर सिंह ने साल 1960 में बंदूक उठा ली. कुछ ही महीनों में मोहर सिंह का नाम चंबल घाटी में गूंजने लगा. हर तरफ मोहर सिंह के नाम का आतंक था.

हाल ये था कि इलाके की पुलिस भी उनके नाम से थर्रा जाती थी. उस वक्त ये कहावत मशहूर थी कि जब कोई बच्चा रोता है, उसकी मां कहती थी, सो जाओ नहीं तो मोहर सिंह आ जाएगा. उस डर और खौफ को शोले फिल्म में गब्बर के नाम से दर्शाया भी गया. डाकू मोहर सिंह ने 12 सालों तक बीहड़ों में राज किया. लेकिन साल 1972 में उन्होंने सरकार के सामने सरेंडर कर दिया था. उस वक्त उनके गैंग पर 12 लाख रुपये का इनाम था. यहां तक कि अकेले डाकू मोहर सिंह पर 2 लाख रुपये का इनाम था.
समाज सेवा और पर्यावरण संरक्षण
समर्पण करने के बाद मोहर सिंह की जिंदगी पूरी तरह बदल गई थी. वह सामाजिक कार्यों में जुट गए थे. गरीब लड़कियों की शादी कराना, जरूरतमंदों की मदद करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था. वो गांव में अपने परिवार के साथ खेती-बाड़ी का काम करते थे. साथ ही पूर्व दस्यु मोहर सिंह ने जमीन बचाने के लिए अभियान चलाया था. उन्होंने हरियाली को खूब बढ़ावा दिया. उनका मकसद था कि खेती की जमीन को बचाया जाए. पेड़-पौधे ज्यादा से ज्यादा लगाए जाएं. आखरी दम तक वो लोगों के काम आते रहे.